नमस्कार दोस्तों आज हम बात करेंगे एक प्रमुख त्योहार मकर संक्रांति बारे में जो हर साल 14 जनवरी को मनाया जाता है। यह पर्व सूर्य देव के धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करने का प्रतीक है, जिसे उत्तरायण की शुरुआत माना जाता है। ठंड का अंत और बसंत ऋतु का आगमन इस दिन से जुड़ा होता है। इस अवसर पर लोग पतंग उड़ाते हैं, खिचड़ी बनाते हैं, तिल-गुड़ का सेवन करते हैं और दान-पुण्य करते हैं। लेकिन इस त्योहार का सबसे गहरा महत्व पौराणिक कथाओं से जुड़ा है।
धर्म शास्त्रों में वर्णित एक प्रमुख कथा के अनुसार, मकर संक्रांति के दिन विशेष कथा का पाठ या श्रवण करने से घर में सुख-शांति बनी रहती है, शनि दोष दूर होता है, मनचाही इच्छाएं पूरी होती हैं और धन-धान्य की कभी कमी नहीं रहती।
सूर्य का राशि परिवर्तन- इस दिन सूर्य दक्षिणायन से निकलकर उत्तरायण में प्रवेश करता है। ज्योतिष और मान्यता के अनुसार, यह समय सकारात्मक ऊर्जा, तरक्की और शुभ फलों का संकेत देता है।
सूर्य के उत्तरायण होने के बाद से देवों की ब्रह्म मुहूर्त उपासना का पुण्यकाल प्रारंभ हो जाता है। इस काल को ही परा-अपरा विद्या की प्राप्ति का काल कहा जाता है। इसे साधना का सिद्धिकाल भी कहा गया है। इस काल में देव प्रतिष्ठा, गृह निर्माण, यज्ञ कर्म आदि पुनीत कर्म किए जाते हैं। मकर संक्रांति के एक दिन पूर्व से ही व्रत उपवास में रहकर योग्य पात्रों को दान देना चाहिए।
मकर संक्रांति से जुड़ी एक अन्य महत्वपूर्ण पौराणिक कथा राजा सगर और कपिल मुनि से संबंधित है। एक समय राजा सगर के 60 हजार पुत्र थे। एक बार देवराज इंद्र ने उनके अश्वमेध यज्ञ का घोड़ा चुरा लिया और कपिल मुनि के आश्रम में बांध दिया। राजा सगर के पुत्रों ने घोड़े की खोज में कपिल मुनि के आश्रम पहुंचकर उन्हें अपशब्द कहे और घोड़े चोरी का झूठा आरोप लगा दिया।
क्रोधित होकर कपिल मुनि ने अपनी दृष्टि से सभी 60 हजार पुत्रों को भस्म कर दिया। राजा सगर ने इंद्र से सिफारिश करवाई और कपिल मुनि से माफी मांगी। मुनि ने बताया कि भस्म पुत्रों को मोक्ष प्राप्ति के लिए मां गंगा को पृथ्वी पर लाना होगा।
राजा सगर के पोते अंशुमान और फिर उनके पुत्र राजा भगीरथ ने कठोर तपस्या की। भगीरथ की तपस्या से प्रसन्न होकर मां गंगा पृथ्वी पर अवतरित हुईं। गंगा के पवित्र जल से राजा सगर के 60 हजार पुत्रों को मोक्ष प्राप्त हुआ। धार्मिक मान्यता है कि गंगा का यह अवतरण मकर संक्रांति के दिन हुआ था, इसलिए इस दिन पवित्र नदियों- खासकर गंगा में स्नान करने से पापों का नाश होता है और पितरों को शांति मिलती है। प्रयागराज में माघ मेला इसी से जुड़ा है।
महाभारत में पितामह भीष्म ने सूर्य के उत्तरायण होने पर ही स्वेच्छा से शरीर का परित्याग किया था। उनका श्राद्ध संस्कार भी सूर्य की उत्तरायण गति में हुआ था। फलतः आज तक पितरों की प्रसन्नता के लिए तिल अर्घ्य एवं जल तर्पण की प्रथा मकर संक्रांति के अवसर पर प्रचलित है।
रामायण काल से भारतीय संस्कृति में दैनिक सूर्य पूजा का
प्रचलन चला आ रहा है। राम कथा में मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम द्वारा नित्य सूर्य पूजा का उल्लेख मिलता है।
Disclaimer: यह जानकारी सामान्य ज्ञान और इतिहास से जोड़ने के लिए दिया गया है भारतीय इतिहास एक महत्वपूर्ण खजाना है
