होलिका दहन की कहानी
प्रह्लाद से जुड़ी एक लोककथा के अनुसार तभी से होली का त्यौहार आरंभ हुआ था। प्रह्लाद ईश्वर को समर्पित एक बालक था। परन्तु उसके पिता ईश्वर को नहीं मानते थे। वे बहुत घमंडी और क्रूर राजा थे। तो कहानी कुछ इस तरह से आगे बढ़ती है कि प्रह्लाद के पिता एक नास्तिक राजा थे और उनका ही पुत्र हर समय ईश्वर का नाम जपता रहता था। इस बात से आहात होकर वह अपने पुत्र को सबक सिखाना चाहते थे। उन्होंने अपने पुत्र को समझाने के सारे प्रयास किए, परन्तु प्रह्लाद में कोई परिवर्तन नहीं आया। जब वह प्रह्लाद को बदल नहीं पाए, तो उन्होंने उसे मारने की सोची। इसलिए उन्होंने अपनी एक बहन की मदद ली। उनकी बहन को यह वरदान प्राप्त था कि यदि वह अपनी गोद में किसी को भी लेकर अग्नि में प्रवेश करेगी, तो स्वयं उसे कुछ नहीं होगा, परन्तु उसकी गोद में बैठा व्यक्ति भस्म हो जाएगा। राजा की बहन का नाम होलिका था। होलिका ने प्रह्लाद को जलाने के लिए अपनी गोद में बिठाया, परन्तु प्रह्लाद के स्थान पर वह स्वयं जल गई और “हरि ॐ” का जाप करने एवं ईश्वर को समर्पित होने के कारण, प्रह्लाद की आग से रक्षा हो गई और वह सुरक्षित बाहर आ गया।
सभी रंगों का उद्गम सफेद रंग से हुआ है, पर इन सभी रंगों को आपस में मिलाने पर यह काले रंग में परिवर्तित हो जाते हैं। जब हमारा मन उज्जवल और चेतना शुद्ध, शांत, प्रसन्न एवं ध्यानस्थ हो, तो विभिन्न रंगों एवं भूमिकाओं का जन्म होता है। हमें वास्तविक रूप से अपनी सभी भूमिकाओं को निभाने की शक्ति प्राप्त होती है। हमें अपनी चेतना में बार बार डुबकी लगानी होगी। यदि हम केवल बाहर ही देखते रहें और आसपास के बाहरी रंगों से खेलते रहें, तो हम अपने चारों ओर अन्धकार पाने के लिए मजबूर हो जाएँगे। अपनी सभी भूमिकाओं को पूरी निष्ठा एवं गंभीरता के साथ निभाने के लिए हमें भूमिकाओं के मध्य गहन विश्राम लेना होगा। गहन विश्राम में बाधा पंहुचाने वाला सबसे बड़ा कारक इच्छाएँ हैं। इच्छाएँ तनाव की द्योतक हैं। यहाँ तक कि छोटी सी या तुच्छ इच्छा भी बड़ा तनाव देती है। बड़े बड़े लक्ष्य अक्सर कम चिंताएँ देते हैं ! अधिकतर, इच्छाएँ मन को कष्ट देती हैं।
प्रहलाद और होलिका सबसे लोकप्रिय कहानियों में से एक प्रहलाद और होलिका की कहानी है। यह कथा दुष्ट राजा हिरण्यकशिपु से शुरू होती है, जो अमर रहना चाहता था। उसने अपने पूरे राज्य को उसे देवता मानकर पूजने के लिए बाध्य किया। उसका पुत्र प्रहलाद हिंदू देवता विष्णु का परम भक्त था और उसने अपने पिता की पूजा करने से इनकार कर दिया।होली की पूर्व संध्या (या होलिका दहन) पर अलाव जलाना बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है।होली की पूर्व संध्या (या होलिका दहन) पर अलाव जलाना बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है।क्रोधित राजा ने अपने पुत्र की हत्या करने के लिए अपनी बहन होलिका की सहायता ली। कहा जाता था कि होलिका पर अग्नि का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। उसे प्रहलाद को अपने साथ आग में ले जाना था ताकि वह जल जाए, लेकिन वह स्वयं जीवित रहे।