अभिमन्यु कौन थे?

अभिमन्यु  महाभारत का वीर योद्धा थे । जिसने 16 वर्ष की आयु में चक्रव्यूह को चुनौती दी । महाभारत भारतीय संस्कृति का एक ऐसा अमूल्य ग्रंथ है, जिसमें अनेक महान योद्धाओं की गाथाएँ दर्ज हैं। इन महान योद्धाओं में एक नाम ऐसा भी है, जो कम उम्र में ही अपने अद्भुत साहस, वीरता और बलिदान के लिए जाना जाता है — वह नाम है अभिमन्यु। वह अर्जुन और सुभद्रा का पुत्र तथा भगवान श्रीकृष्ण का भांजा था। उसकी कहानी न केवल वीरता की मिसाल है, बल्कि यह भी दर्शाती है कि किस प्रकार एक योद्धा अपने धर्म और कर्तव्य के लिए अपने प्राणों की आहुति देने को तैयार रहता है।

अभिमन्यु का जन्म एक ऐसे कुल में हुआ था जहाँ वीरता और धर्म का पालन सर्वोपरि था। वह अर्जुन जैसा महान धनुर्धर पिता और श्रीकृष्ण जैसा चतुर और नीति में निपुण मामा पाकर प्रारंभ से ही एक योग्य योद्धा बन गया। उसकी शिक्षा-दीक्षा भी उच्च कोटि की थी, और उसने अल्पायु में ही अस्त्र-शस्त्र चलाना, युद्ध की नीतियाँ, और रणकौशल में निपुणता प्राप्त कर ली थी।

अभिमन्यु से हमें क्या सीख मिलती है?

अभिमन्यु केवल एक योद्धा नहीं था, वह एक प्रतीक था — साहस का, कर्तव्य का, और अन्याय के खिलाफ उठ खड़े होने का। वह यह सिखाता है कि उम्र कभी भी साहस को परिभाषित नहीं करती। यदि मन में उद्देश्य स्पष्ट हो और आत्मबल दृढ़ हो, तो कोई भी परिस्थिति हमारे साहस को रोक नहीं सकती। आज के समय में जब चुनौतियाँ अनेक रूपों में आती हैं — कभी मानसिक दबाव, कभी सामाजिक अन्याय, तो कभी व्यक्तिगत संघर्ष — अभिमन्यु की कहानी हमें प्रेरणा देती है कि हर परिस्थिति में डटकर खड़े रहो, भले ही परिणाम कुछ भी हो।

कौन कौन चक्रव्यूह भेदना जानता था?

महाभारत काल में, चक्रव्यूह भेदने एवं उससे बाहर निकलने का पुर्ण ज्ञान केवल श्री कृष्ण, अर्जुन, द्रोणाचार्य एवं प्रद्युम्न (श्री कृष्ण के पुत्र) को था। इनके अलावा केवल अभिमन्यु ही ऐसे थे जो चक्रव्यूह में प्रवेश करना जानता थे। अपनी माता के गर्भ में रहते हुए तेजस्वी अभिमन्यु ने चक्रव्यूह भेदना सीखा था। जब अर्जुन, अपनी गर्भवती पत्नी सुभद्रा को चक्रव्यूह भेदना समझा रहे थे। परंतु, माता के बीच मे सो जाने के कारण, अभिमन्यु पूर्ण ज्ञान नही ले सके। चक्रव्यूह भेदना तो सीख लिया परंतु बाहर निकलना नही सीख पाए। अर्जुन एवं सुभद्रा पुत्र अभिमन्यु एक कुशल योद्धा थे। अभिमन्यु को रौद्रधारी भी कहा जाता है, क्योंकि वह रौद्र नामक धनुष को धारण करते थे। यह धनुष उन्हें उनके जेष्ठ मामा बलराम से प्राप्त हुआ था। मूल रूप से यह धनुष महादेव का है। महादेव ने यह धनुष बलराम जी को दिया था।

लड़ते-लड़ते थक जाना : जैसे-जैसे अभिमन्यु चक्रव्यूह के सेंटर में पहुंचते गए, वैसे-वैसे वहां खड़े योद्धाओं का घनत्व और योद्धाओं का कौशल उन्हें बढ़ा हुआ मिला, क्योंकि वे सभी योद्धा युद्ध नहीं कर रहे थे बस खड़े थे जबकि अभिमन्यु युद्ध करता हुआ सेंटर में पहुंचता है। वे जहां युद्ध और व्यूहरचना तोड़ने के कारण मानसिक और शारीरिक रूप से थके हुए थे, वहीं कौरव पक्ष के योद्धा तरोताजा थे। ऐसे में अभिमन्यु के पास चक्रव्यूह से निकलने का ज्ञान होता, तो वे बच जाते या उनके पीछे अन्य योद्धा भी उनका साथ देने के लिए आते तो भी वे बच जाते। लेकिन थकान के कारण वे अधिक जोश और होश से लड़ नहीं पाए।

अभिमन्यु वध : अर्जुन-पुत्र अभिमन्यु चक्रव्यूह भेदने के लिए उसमें घुस गया। चक्रव्यूह में प्रवेश करने के बाद अभिमन्यु ने कुशलतापूर्वक चक्रव्यूह के 6 चरण भेद लिए। इस दौरान अभिमन्यु द्वारा दुर्योधन के पुत्र लक्ष्मण का वध किया गया। अपने पुत्र को मृत देख दुर्योधन के क्रोध की कोई सीमा न रही। तब कौरवों ने युद्ध के सारे नियम ताक में रख दिए।

क्या चंद्र देव के पुत्र थे अभिमन्यु?

श्री कृष्ण ने जब भगवान ब्रह्मा से यह कहा था कि पृथ्वी पर बुराई का नाश करने के लिए देवताओं को उनके साथ आना होगा, तब हर देवता ने अपने किसी ना किसी रूप को उनके साथ भेजा था। उस वक्त चंद्र देव ने अपने पुत्र सुवर्चा को भी भेजा। पर वो नहीं चाहते थे कि उनका पुत्र अधिक समय के लिए उनसे अलग हो जाए।

यही कारण है कि उन्होंने कहा था कि उनके पुत्र को 16 वर्ष के बाद वापस आना होगा। भगवान कृष्ण के रूप में भगवान विष्णु चाहते थे कि चंद्र देव का पुत्र कुरुक्षेत्र के युद्ध में आए इसलिए चंद्र देव ने मना नहीं किया, लेकिन उसे जल्दी अपने पास भी बुला लिया।

चंद्र देव का पुत्र ही अभिमन्यु के रूप में सुभद्रा और अर्जुन के बेटे के रूप में जन्मा। यही कारण है कि अभिमन्यु को चंद्र का अंश भी कहा जाता है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *